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Tuesday, 29 May 2018

एवरेस्ट सम्मिट,1953

कहते हैं इंसान अगर किसी चीज को पूरे दिल से चाहे, तो पूरी कायनात उसे उससे मिलवाने में जुट जाती है।माना के थोड़ा फिलमी डायलाग है, लेकिन सच है। इंसान अगर ठान ले तो क्या नही कर सकता, दुनिया की कोई भी ताकत उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचने से नही रोक सकती, फिर चाहे वो लक्ष्य चाँद पर जाने का हो या फिर माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का।
29 मई 1953, यही वह दिन था, जब सारे विश्व ने माना कि इच्छाशक्ति के आगे बड़े से बड़ा पहाड़ भी घुटने टेक देता है। आज के दिन ही 1953 में न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाल के शेरपा टेन्ज़िंग नोर्गे, माउंट एवरेस्ट के शिखर तक पहुंचने वाले पहले पर्वतारोही बन गए, जो समुद्र तल से 29,002  फीट ऊपर पृथ्वी पर सबसे ऊंचा बिंदु है । उन्होंने एवरेस्ट पर नौंवी ब्रिटिश चढ़ाई के दौरान जॉन हंट की अगुवाई में एवरेस्ट फ़तेह किया.
एवरेस्ट फतह की खबर ब्रिटेन में महारानी के अभिषेक के दिन पहुँची थी। चूंकि हिलेरी न्यूजीलैंड के थे और इस तरह वे राष्ट्रमंडल के नागरिक हुए, लिहाजा ब्रिटेन में भी उनकी उपलब्धि पर जश्न मनाया गया। हिलेरी को उनकी सफलता के लिए नाइट की उपाधि दी गई। अपनी सफलता के अगले दो दशकों में हिलेरी ने हिमालय में दस अन्य चोटियाँ भी फतह की।
एक महानायक होते हुए भी वे जीवनभर बेहद सादगी से रहे। अपने जीवन को नेपाली शेरपाओं को समर्पित करने वाले हिलेरी ने नेपाल में 63 विद्यालयों के अतिरिक्त अनेक अस्पतालों, पुलों व हवाई पट्टी का भी निर्माण किया। उनके हिमालय ट्रस्ट ने नेपाल के लिए प्रति वर्ष ढाई लाख अमरीकन डॉलर जुटाए और हिलेरी ने निजी तौर पर नेपाल अभियान में मदद दी।
'सर' हिलेरी पर्यावरण को पहुँच रहे नुकसान के प्रति बेहद चिंतित रहते थे। उन्हें कुछ पर्वतारोहियों के इस दिशा में उदासीन रवैये से भी तकलीफ पहुँचती थी। उन्होंने न्यूजीलैंड के मार्क इंगलिस और विभिन्न समूहों के 40 सदस्यों की इसलिए आलोचना की उन्होंने मई 2006 में ब्रिटेन के पर्वतारोही डेविड शाफ को मरने के लिए छोड़ दिया था।
बचपन में ही तेन्जिंग एवरेस्ट के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित अपने गाँव, जहां शेरपाओं (पर्वतारोहण में निपुण नेपाली लोग, आमतौर पर कुली) का निवास था, से भागकर भारत के पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग में बस गए। 1935 में वे एक कुली के रूप में वह सर एरिक शिपटन के प्रारम्भिक एवरेस्ट सर्वेक्षण अभियान में शामिल हुए। अगले कुछ वर्षों में उन्होने अन्य किसी भी पर्वतारोही के मुक़ाबले एवरेस्ट के सर्वाधिक अभियानों में हिस्सा लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वह कुलियों के संयोजक अथवा सरदार बन गए। और इस हैसियत से वह कई अभियानों पर साथ गए। 1952 में स्वीस पर्वतारोहियों ने दक्षिणी मार्ग से एवरेस्ट पर चढ़ने के दो प्रयास किए और दोनों अभियानों में तेन्जिंग सरदार के रूप में उनके साथ थे। 1953 में वे सरदार के रूप में ब्रिटिश एवरेस्ट के अभियान पर गए और हिलेरी के साथ उन्होने दूसरा शिखर युगल बनाया।
तेनज़िंग की इस ऐतिहासिक सफलता ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया है। भारत के अतिरिक्त इंग्लैंड एवं नेपाल की सरकारों ने भी उन्हें सम्मानित किया था। 1959 में उन्हें 'पद्मभूषण' से अलंकृत किया गया। वास्तव में 1936-1953 तक के सभी एवरेस्ट अभियानों में उनका सक्रिय सहयोग रहा था।
इस अभियान का एक  प्रेरणादयी प्रसंग भी है। इस अभियान के लीडर कर्नल हंट थे। हंट ने खुद पीछे रहकर इस अभियान का सफल नेतृत्व किया था। वह चाहते तो चोटी पर चढ़ने वाली टीम का हिस्सा बन सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा न करके अपनी दो बेस्ट टीमें बनाईं। पहली टीम बोरडिलन, ईवान्स की। दूसरी हिलरी और तेनजिंग की। 
चढ़ाई से पहले वाली रात दोनों के लिए काफी खतरनाक थी। तेज बर्फीली हवाएं चल रही थीं। रात में हिलरी के जूते गलती से बाहर रह गए थे जब अगले दिन सुबह हिलरी उठे तो उनके पैर बर्फ में जम गए। 
अंतिम चढ़ाई के समय उनके सामने एक खड़ी चट्टान थी। वह चट्टान एक बड़ी बाधा थी क्योंकि उसके रहते उनलोगों को दूसरा रास्ता लेना पड़ता जो लंबा था और एवरेस्ट तक पहुंचने का समय लंबा हो जाता है। इस मौके पर हिलरी ने दिमाग लगाया और चट्टान की दरार में से रास्ता बनाया। उस रास्ते से होकर पहले हिलरी और उनके पीछे तेनजिंग आगे बढ़े। 29 मई, 1953 को 11 बजकर 30 मिनट पर वे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर पहुंच गए। वहां पर हिलरी ने कुल्हाड़ी के साथ तेनजिंग का फोटो लिया।

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