ये आईना देखता बहुत है
ये आईना बोलता बहुत है।
कभी सच्चाई दिखलाता है,
कभी झूठ से दिल लुभाता है।
हकीकत से झुठलाता है,
तो कभी झुठलाक़े हकीकत दिखता है।
सपनो को जीना सिखाता है,
खुद को खुद से मिलाता है।
मासूम मुस्कान की परछाई बन जाता है,
लेकिन बुराई की छाप अंदर ही समेट जाता है ।
कहने को तो सच्चाई का प्रतिबिंब है,
पर व्यक्तित्व पर खड़े करता प्रश्न चिन्ह है।
बिना बोले सब कह जाता है,
पर न जाने क्यों सब अनसुना रह जाता है।
हर दिन खुद को बदलता है,
हर रंग रूप में ढलता है।
साथ मे हंसता है, साथ मे रोता है।
सच यही कि हर किसी को सच दिखाता आईना,
सच यह भी कि किसी को सच कह न पाता आईना।

आईना कभी झूठ नहीं बोलता
ReplyDeletetrue.
Deleteबेहतरीन कविता
ReplyDeleteThankyou
DeleteReflection +++wonderful
ReplyDelete